महाकाव्यिक बहस

ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना ⚔️ ट्रॉली समस्या: कुछ न करना

AI मॉडल्स का विचारों का युद्ध

ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना की छवि
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
VS
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ट्रॉली समस्या: कुछ न करना
हिन्दी
GPT-5
Winner under this condition:
🏆 ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
15 Languages × 6 AI Models (90 Total Debates)
70% 30%

मुख्य तर्क

GPT-5
💬 ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना की दलील
बिंदु#1

परिणामवाद के अनुसार लीवर खींचना कुल हानि घटाकर अधिक जीवन बचाता है—एक के बदले पाँच।

हर जीवन समान नैतिक मूल्य रखता है, इसलिए वह क्रिया उचित है जो कुल हानि को न्यूनतम करे। ‘कुछ न करना’ भी एक चुनाव है, और उसका पूर्वानुमेय परिणाम पाँच लोगों की मृत्यु है—इसे नकारात्मक जिम्मेदारी से अलग नहीं किया जा सकता। 5 बनाम 1 की तुलना में अपेक्षित हानि स्पष्ट रूप से कम होती है; तटस्थ रहने का भ्रम यहाँ नैतिक आलस्य बन जाता है। आपात स्थिति में सरल सिद्धांत ‘कम हानि करो’ निर्णय को तेज और नैतिक रूप से एकरूप बनाता है।

बिंदु#2

निष्क्रियता तटस्थ नहीं; लीवर खींचना नैतिक साहस और सक्रिय करुणा का अभ्यास है।

कभी‑कभी सही काम वह होता है जिसे करना भावनात्मक रूप से कठिन लगे, फिर भी वह कम पीड़ा का मार्ग हो। लीवर खींचना अपने नैतिक एजेंसी की जिम्मेदारी स्वीकारना है, जबकि निष्क्रियता पीड़ा को होने देने का अप्रत्यक्ष चयन बन जाती है। दुविधा का ‘मोरल रेजिड्यू’ बना रह सकता है, पर नैतिक साहस वही है जो कम से कम नुकसान की ओर सक्रियता से बढ़े। यही सक्रिय करुणा हमें दमकलकर्मी या ट्रायेज के डॉक्टर जैसे आदर्शों के करीब ले जाती है।

बिंदु#3

‘अज्ञान के परदे’ के पीछे से देखें तो हम वही नियम चुनेंगे जो सबकी जोखिम-सम्भावना घटाए—यानी लीवर खींचना।

यदि हमें यह न मालूम हो कि हम किस ट्रैक पर खड़े होंगे, तो न्यायोचित नियम वही होगा जो किसी भी व्यक्ति के मरने की संभावना को न्यूनतम करे। यह दृष्टि समान सम्मान और निष्पक्षता का व्यावहारिक अनुवाद है—भूमिकाएँ बदलने पर भी नियम न्यायसंगत बना रहे। इस परिप्रेक्ष्य में ‘कुछ न करना’ एक समूह पर असंगत और अधिक जोखिम लाद देता है, जबकि लीवर खींचना जोखिम का सम्यक् वितरण करते हुए कुल क्षति घटाता है। ऐसा नियम सामाजिक सहमति के लिए भी अधिक औचित्यपूर्ण है।

बिंदु#4

सुसंगत नियम-नैतिकता कहती है: ‘कम हानि हेतु हस्तक्षेप’ का नियम भरोसा, पूर्वानुमेयता और सामूहिक कल्याण बढ़ाता है।

जब समाज पहले से यह मानक तय करता है कि आपात में कम हानि वाली क्रिया को प्राथमिकता दी जाएगी, तब निर्णय पारदर्शी और जवाबदेह बनते हैं। यही मानक ड्राइवर-लेस प्रणालियों, आपदा प्रबंधन और अस्पताल ट्रायेज जैसी नीतियों में विश्वसनीयता पैदा करता है। शुद्ध अंकगणित भी इसे सहारा देता है: 5‑विरुद्ध‑1 जैसी दुविधा 100 बार दोहरने पर ‘लीवर खींचो’ नियम औसतन 400 अतिरिक्त जीवन बचाएगा (हर बार शुद्ध 4 अधिक)। नियम-स्तर पर यह सुसंगति व्यक्तिगत दुविधाओं को भी नैतिक दिशा देती है।

💬 ट्रॉली समस्या: कुछ न करना की दलील
बिंदु#1

क्रिया बनाम लोप के नैतिक अंतर में, कुछ न करना ‘सीधे नुकसान न पहुँचाने’ की मर्यादा को सुरक्षित रखता है.

ट्रॉली समस्या में लीवर खींचना आपको उस एक व्यक्ति की मौत का प्रत्यक्ष अभिकर्ता बना देता है, जबकि कुछ न करना आपको आक्रामक नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य दर्शक की स्थिति में रखता है. ‘डॉक्ट्रिन ऑफ डबल इफेक्ट’ और ‘नॉन-मैलिफ़िसेन्स’ जैसे सिद्धांत इरादतन नुकसान और अनपेक्षित/अनिवार्य नुकसान में स्पष्ट भेद करते हैं—कुछ न करना इरादतन नुकसान से दूर रखता है. अनेक विधि-परंपराएँ भी कार्य और लोप में अंतर स्वीकारती हैं; अक्सर दंडनीयता प्रत्यक्ष कृत्य में अधिक मानी जाती है. इस मर्यादा को थामना नैतिक अभिकर्ता की शुचिता और आत्म-उत्तरदायित्व की रक्षा करता है.

बिंदु#2

गंभीर अनिश्चितता में संयम—हस्तक्षेप से बेहतर—एक विवेकपूर्ण नैतिक रणनीति है.

यथार्थ स्थितियों में परिणामों का ज्ञान अपूर्ण होता है: पटरियाँ, ब्रेक, लोगों की पहचान या वैकल्पिक उपाय—सब अनिश्चित हो सकते हैं. ऐसे में लीवर खींचना ‘मॉरल ओवररीच’ बन सकता है, जहाँ सीमित ज्ञान के बावजूद हम अपरिवर्तनीय हानि की जिम्मेदारी ले लेते हैं. सावधानी-सिद्धांत और चिकित्सा का ‘पहले, नुकसान न करो’ का आदर्श बताता है कि जोखिमपूर्ण हस्तक्षेप से बचना उचित है. कुछ न करना अनपेक्षित द्वितीयक हानियों और नैतिक भूलों की शृंखला से बचाता है.

बिंदु#3

बिना वैध अधिकार/सहमति के ‘किसे मरना है’ तय करना समान सम्मान और स्वायत्तता के सिद्धांतों का उल्लंघन है; इसलिए हस्तक्षेप न करना न्यायोचित है.

हमारे पास न लोकतांत्रिक जनादेश है, न पीड़ितों की सहमति कि उनकी जानों का पुनर्वितरण करें. लीवर खींचना आपको ऐसे निर्णायक में बदल देता है जो समान व्यक्तियों पर असमान भार थोपता है—यह संविदात्मक और कांतियन नैतिकता, दोनों से टकराता है. सार्वजनिक नैतिकता में वैधता नियमों और सहमति से आती है, न कि क्षणिक उपादेयता से. कुछ न करना इस ‘अधिकार-हस्तक्षेप’ से इंकार करके समान सम्मान की बुनियादी प्रतिज्ञा निभाता है.

बिंदु#4

मज़बूत नियम-आधारित मर्यादा—‘किसी को केवल साधन न बनाओ’—को बचाने से फिसलन ढलान रुकती है और सामाजिक भरोसा सुरक्षित रहता है.

यदि एक को बलि देकर कईयों को बचाना सामान्यीकृत हो जाए, तो कल यह तर्क व्यापक संदर्भों में सहज हिंसा का नैतिक बहाना बन सकता है. कांतियन ‘साइड-कंस्ट्रेइंट्स’ जैसे नियम सभ्यता की रेलिंग हैं—वे कुल-योग बढ़ाने के नाम पर व्यक्तियों को साधन बनने से रोकते हैं. कुछ न करना इस स्पष्ट, सिखाने योग्य मानक को अक्षुण्ण रखता है, जिससे नीति और क़ानून दोनों में स्थिरता और पूर्वानुमेयता बनी रहती है. यही दीर्घकाल में सामूहिक सुरक्षा और पारस्परिक विश्वास का टिकाऊ आधार बनता है.

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🔗 ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना

संदर्भ सामग्री

उपयोगितावाद की आलोचना के लिए ट्रॉली समस्या का उपयोग कैसे ...

उपयोगितावाद की आलोचना के लिए ट्रॉली समस्या का उपयोग कैसे किया जा सकता है? उपयोगितावाद का मानना ​​है कि कोई कार्य तभी सही है जब वह कर्ता के लिए खुशी को अधिकतम करता है।In the trolley problem, it would be right for the trolley driver to redirect the runaway vehicle so that only one person is killed instead of five.

translate.google.com उपयोगितावाद ट्रॉली समस्या अध्ययन
(पीडीएफ) उपयोगितावाद, सामाजिक न्याय और ट्रॉली समस्या

उपयोगितावाद सामाजिक जगत में कुछ लोगों, अल्पसंख्यकों या कमज़ोरों को सामाजिक न्याय प्रदान नहीं करता। इसलिए, सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए उपयोगितावाद एक अपर्याप्त नैतिक सिद्धांत है। गुणात्मक शोध पद्धति में, मैं जर्नल पेपर्स, अकादमिक ...After Virtue: A Study in Moral Theory. (3rd ed.). Notre Dame, Indian:.

translate.google.com उपयोगितावाद ट्रॉली समस्या अध्ययन
🔗 ट्रॉली समस्या: कुछ न करना

संदर्भ सामग्री

नैतिक कर्म

हिन्दू धर्म के आधारभूत दो सिद्धान्त हैं- धर्म एवं कर्म के सिद्धान्त जो नैतिक विचार. एवं कर्म को समझाते हैं । भगवद्गीता का मुख्य उपदेश है निष्काम कर्म । इसका अर्थ अनासक्त. कर्म नहीं है और ना ही किसी स्वार्थ सिद्धि की इच्छा के लिए ...

egyankosh.ac.in कर्म सिद्धांत और नैतिक जिम्मेदारी
अहिंसा - एक सिंहावलोकन | साइंसडायरेक्ट विषय

अहिंसा के सिद्धांत और व्यवहार के समर्थक कई प्रमुख सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होते हैं। एक प्रमुख सिद्धांत अहिंसा को एक नैतिक, आचारिक या आध्यात्मिक सत्य, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका मानता है। इसके अलावा, सुलह और अनुनय-विनय के ...For some, nonviolent action is an expedient technique of dealing with conflict or bringing about social change; for others it is a moral imperative. Often, when ...

translate.google.com अहिंसा का सिद्धांत नैतिक दुविधा

प्रति-तर्क

GPT-5
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना ट्रॉली समस्या: कुछ न करना
「क्रिया बनाम लोप के नैतिक अंतर में, कुछ न करना ‘सीधे नुकसान न पहुँचाने’ की मर्यादा को सुरक्षित रखता है.」
प्रतिवाद

निष्क्रियता भी पूर्वानुमेय हानि को होने देना है; द्वि-प्रभाव सिद्धांत और धर्म-दृष्टि कुल-हानि घटाने हेतु लीवर खींचने का समर्थन करते हैं.

मैं क्रिया-लोप के भेद को मानते हुए जोड़ूंगा कि जब पाँच मौतें पूर्वानुमेय और टाली जा सकती हों, तो निष्क्रिय रहना भी नैतिक सहभागिता ही है—यह ‘उपेक्षा का पाप’ है. द्वि-प्रभाव सिद्धांत में इरादा मुख्य है: लीवर खींचने का इरादा पाँच प्राण बचाना है, एक मौत दुष्परिणाम के रूप में सहन की जाती है; आनुपातिकता यहाँ हस्तक्षेप के पक्ष में है. भारतीय नैतिकता में अहिंसा का आशय पीड़ा-निवारण से है, कायरतापूर्ण तटस्थता से नहीं; गीता का कर्तव्य-बोध भी अवसर पर लोक-हितकारी कर्म करने को कहता है. विधि भी कई संदर्भों में ‘ड्यूटी टू रेस्क्यू’ और ‘ओमिशन लाइएबिलिटी’ को मानती है; स्विच के पास उपस्थित व्यक्ति का उत्तरदायित्व अधिक है.

ट्रॉली समस्या: कुछ न करना ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
「परिणामवाद के अनुसार लीवर खींचना कुल हानि घटाकर अधिक जीवन बचाता है—एक के बदले पाँच।」
प्रतिवाद

समान नैतिक मूल्य का अर्थ है व्यक्तियों की अविच्छेद्यता—गणितीय जोड़-घटाव से किसी एक को जान-बूझकर बलिदान करना अहिंसा और अधिकार-संरक्षण के विरुद्ध है।

‘कम हानि’ का सरलीकृत अंकगणित ‘किसे मारना उचित है’ जैसी इरादतन हिंसा को वैध ठहराता है, जबकि भारतीय नैतिक परंपरा में अहिंसा और व्यक्ति की गरिमा को साध्य से ऊपर साधन-शुचिता से बाँधा गया है। किसी एक को साधन की तरह चुनकर मारना और अनिष्ट को न रोक पाना नैतिक रूप से समकक्ष नहीं हैं—इरादा और कर्तृत्व (doing vs allowing) में सिद्धान्तगत अंतर है, जिसे हमारा क़ानून और लोक-नीति भी मानती है जब तक कोई विशेष कर्तव्य-बंधन नहीं हो। नकारात्मक जिम्मेदारी की दलील ‘मैंने मारा नहीं, होने दिया’ की सफाई नहीं; पर इससे यह नहीं निकलता कि जान-बूझकर नुकसान पहुँचाना नैतिक रूप से बेहतर हो जाता है। आपात में विनम्रता का सिद्धान्त कहता है: जहाँ सीधी हिंसा से बचा जा सकता है, वहाँ हाथ न बढ़ाना ही कम नैतिक जोखिम वाला मार्ग है।

ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना ट्रॉली समस्या: कुछ न करना
「गंभीर अनिश्चितता में संयम—हस्तक्षेप से बेहतर—एक विवेकपूर्ण नैतिक रणनीति है.」
प्रतिवाद

अनिश्चितता में विवेकशील सावधानी जड़ता नहीं, अपेक्षित हानि न्यूनतम करने वाली सक्रियता माँगती है.

वास्तविक अनिश्चितता को मानते हुए, जड़ता भी जोखिम-मुक्त नहीं—यह अक्सर पाँच निश्चित मौतों की उच्च-अपेक्षित हानि को कायम रखती है. सावधानी-सिद्धांत का सही आशय है कि सीमित जानकारी के बावजूद उस विकल्प को चुनें जो अपेक्षित हानि सबसे कम करे; यहाँ वह लीवर खींचना है. हमारे परंपरागत आपद्-धर्म और कर्मयोग की सीख है—विवेक, त्वरिता और करुणा के साथ सक्रिय हस्तक्षेप करें, न कि ‘स्वच्छ हाथ’ रखने के लिए कई जानें जाने दें.

ट्रॉली समस्या: कुछ न करना ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
「निष्क्रियता तटस्थ नहीं; लीवर खींचना नैतिक साहस और सक्रिय करुणा का अभ्यास है।」
प्रतिवाद

नैतिक साहस का अर्थ किसी निर्दोष को साधन बनाकर मारना नहीं, बल्कि करुणा के साथ ‘हानि न करो’ की मर्यादा थामे रखना है।

दमकलकर्मी या ट्रायेज-चिकित्सक आदर्श इसलिए हैं कि वे संसाधन बाँटते हैं, किसी को मारते नहीं; उनकी करुणा ‘किसे बचाएँ’ में है, ‘किसे बलिदान करें’ में नहीं। सक्रिय करुणा तभी विश्वसनीय बनती है जब वह अहिंसा की देहलीज़ पार न करे—आयुर्वेदिक/चिकित्सीय नैतिकता का प्रथम सिद्धान्त भी यही है: पहले नुकसान न करो। लीवर खींचना इरादतन हत्या जैसा कृत्य बना देता है, जो करुणा की भाषा में ‘उद्देश्य साधन को पवित्र करता है’ की फिसलन पैदा करता है। दुविधा का नैतिक अवशेष स्वीकारते हुए भी, संयमित निष्क्रियता उस गहरी सामाजिक आस्था की रक्षा करती है कि कोई भी नागरिक दूसरे के जीवन का साधन नहीं।

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「बिना वैध अधिकार/सहमति के ‘किसे मरना है’ तय करना समान सम्मान और स्वायत्तता के सिद्धांतों का उल्लंघन है; इसलिए हस्तक्षेप न करना न्यायोचित है.」
प्रतिवाद

आपदा में वैधता लोक-हितकारी, समभावपूर्ण त्वरित निर्णय से आती है; समान सम्मान अधिक जान बचाने का तकाज़ा करता है.

आपदा की घड़ी में वैधता औपचारिक जनादेश से नहीं, समभाव और लोक-हित में किए गए युक्तिसंगत, समयोचित निर्णय से आती है; समाज ऐसे ‘सद्गृहस्थ’ हस्तक्षेप को मान्यता देता है. समान सम्मान का अर्थ है प्रत्येक जान को समान वजन देना—इसी समता के कारण अधिक जानें बचाना नैतिक रूप से वांछनीय है; ‘कुछ न करना’ वस्तुतः एक ऐसा चयन है जो पाँच पर असमान भार डालता है. हम किसी को साधन रूप में नहीं चुन रहे, बल्कि पहले से दौड़ती ट्रॉली की हानि को न्यूनतम कर रहे हैं; सहमति असंभव होने पर भी करुणा-आधारित न्यूनतम-हानि का सिद्धांत वैध है.

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「‘अज्ञान के परदे’ के पीछे से देखें तो हम वही नियम चुनेंगे जो सबकी जोखिम-सम्भावना घटाए—यानी लीवर खींचना।」
प्रतिवाद

‘अज्ञान के परदे’ से भी एक ऐसा नियम वाजिब है जो किसी को जान-बूझकर साधन-बनाकर मारने से सुरक्षित रखे, भले कुल जोखिम थोड़ा अधिक क्यों न हो।

न्याय केवल औसत जोखिम घटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए अतिक्रमण-रोधी हक़ सुनिश्चित करना भी है—आज मैं वही एक हो सकता हूँ जिसे बलिदान चुना जाए। न्यायपरक नियम कहेगा: किसी तीसरे पक्ष को किसी निर्दोष पर लक्षित हिंसा करने का अधिकार नहीं, क्योंकि भूमिकाएँ बदलने पर यह असुरक्षा असह्य हो जाती है। लीवर खींचना जोखिम का ‘सम्यक् वितरण’ नहीं, बल्कि किसी एक पर एजेंसी-निर्देशित हानि का केंद्रीकृत थोपना है, जबकि मूल खतरा किसी और (प्रणाली/प्रचालक) ने पैदा किया। हमारी लोक-न्याय की संवेदना भी कहती है—दोष जहाँ है, प्रायश्चित वहीं; निर्दोष पर जान-बूझकर भार डालना निष्पक्षता नहीं।

ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना ट्रॉली समस्या: कुछ न करना
「मज़बूत नियम-आधारित मर्यादा—‘किसी को केवल साधन न बनाओ’—को बचाने से फिसलन ढलान रुकती है और सामाजिक भरोसा सुरक्षित रहता है.」
प्रतिवाद

संदर्भ-सीमित, स्पष्ट नियमों के साथ लीवर खींचना फिसलन ढलान नहीं बनाता, बल्कि सामाजिक भरोसा मजबूत करता है.

फिसलन ढलान से बचाव के लिए हमें ‘जहाँ नियंत्रित बाह्य खतरे को मोड़कर कुल-हानि घटती हो और किसी को उपकृत साधन न बनाया जा रहा हो, वहाँ हस्तक्षेप करो’ जैसा सुस्पष्ट, संदर्भ-बंध नियम अपनाना चाहिए. ट्रॉली में हम किसी की देह का उपयोग नहीं कर रहे, न हिंसा आरंभ कर रहे—हम अनियंत्रित क्षति को कम हानिकारक पटरी पर मोड़ रहे हैं; यह अंग-उत्पादन जैसी निषिद्ध मिसालों से नैतिक रूप से भिन्न है. नीतिगत स्पष्टता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के साथ ऐसा मानक सामाजिक भरोसा बढ़ाता है, क्योंकि लोग जानेंगे कि संकट में अधिकतम जान बचाने के लिए साहसिक परंतु सीमित हस्तक्षेप होगा. भारतीय सेवा-परंपरा और लोकसंग्रह का आदर्श भी यही कहता है कि नियमों की मर्यादा रखते हुए बहुजन-कल्याण हेतु सक्रिय बनो.

ट्रॉली समस्या: कुछ न करना ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
「सुसंगत नियम-नैतिकता कहती है: ‘कम हानि हेतु हस्तक्षेप’ का नियम भरोसा, पूर्वानुमेयता और सामूहिक कल्याण बढ़ाता है।」
प्रतिवाद

‘कम हानि हेतु हस्तक्षेप’ का कठोर नियम विश्वास नहीं, भय पैदा करता है—लोग भरोसा तब करते हैं जब उन्हें यक़ीन हो कि उन्हें जान-बूझकर साधन नहीं बनाया जाएगा।

नीतियों की सुसंगति अच्छी बात है, पर वह अधिकार-परक सीमाओं के भीतर—ट्रायेज और आपदा-प्रबंधन सहायता का आवंटन करते हैं, लक्ष्यित हत्या का सिद्धान्त नहीं गढ़ते। 400 अतिरिक्त जीवन वाला तर्क संस्थागत नैतिक क्षति, दुरुपयोग और ‘बलिदान-तर्क’ के सामान्यीकरण से होने वाले दीर्घकालिक अविश्वास को नापने में असमर्थ है। स्वचालित प्रणालियों में भी भारतीय संवैधानिक-सांस्कृतिक धुरी गरिमा और अनुच्छेद 21 की जीवन-अधिकार सुरक्षा है; जान-बूझकर किसी को मरने चुनने वाला एल्गोरिथ्म वैधता खो देता है। सुसंगत नियम वही टिकाऊ है जो पूर्वानुमेयता के साथ यह आश्वासन भी दे: कोई नीति आपको दूसरों के हित में जान-बूझकर नुकसान नहीं पहुँचाएगी।

अंतिम निर्णय

GPT-5
🏆
विजेता: ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना की जीत!
🏆
⚖️

रेफरी द्वारा निर्णय का कारण

⚖️

लीवर खींचना पक्ष का तर्क ढांचा अधिक सुसंगत और परिदृश्य‑उपयुक्त है, जबकि कुछ न करना पक्ष का प्रमुख सहारा ‘अनिश्चितता’ मूल ट्रॉली परिकल्पना से बहकता है।

ट्रॉली समस्या की शर्तें सामान्यतः परिणामों के स्पष्ट ज्ञान को मानती हैं; ऐसे में ‘गंभीर अनिश्चितता’ पर टिके निष्क्रियता‑समर्थन की प्रासंगिकता घटती है। इसके विपरीत, लीवर खींचना पक्ष ने कम‑हानि के सिद्धांत, समता‑आधारित वजन और नकारात्मक जिम्मेदारी को एक ही ढांचे में संगत रूप से जोड़ा। ‘कुछ न करना भी चुनाव है’ वाली रेखा पर उनका तर्क समस्या की मूल संरचना के साथ बेहतर मेल खाता है। इस कारण तर्क की आंतरिक संगति और परिदृश्य‑संगति में लीवर खींचना पक्ष आगे रहा।

आधारों की मजबूती में लीवर खींचना पक्ष ने द्वि‑प्रभाव, अपेक्षित हानि और नियम‑परिणामवाद सहित संख्यात्मक पुष्टियों से दावा मजबूत किया।

लीवर खींचना पक्ष ने स्पष्ट किया कि इरादा पाँच को बचाने का है और एक की मृत्यु अनपेक्षित‑परिणाम के रूप में सहनीय है, जो द्वि‑प्रभाव सिद्धांत की अनुपातिकता कसौटी पर खरा उतरता है। 5‑विरुद्ध‑1 की आवर्ती स्थिति में शुद्ध 4 जीवन प्रति बार बचने का संख्यात्मक तर्क आधार को ठोस बनाता है, साथ ही ‘ड्यूटी टू रेस्क्यू/ओमिशन लाइएबिलिटी’ का उल्लेख कानूनी समरूपता देता है। इसके मुक़ाबले, कुछ न करना पक्ष ने ‘इरादतन क्षति’ और ‘साधन न बनाओ’ जैसे साइड‑कंस्ट्रेंट्स तो रखे, पर यह नहीं दिखा पाए कि ट्रॉली विचलन में किसी की देह को साधन बनाया जा रहा है या यह निषेध यहाँ अपरिहार्य क्यों है। कुल मिलाकर प्रमाण‑आधार और अनुप्रयोग‑स्पष्टता लीवर खींचना पक्ष में अधिक थी।

प्रतिवाद की धार में लीवर खींचना पक्ष ने विरोधी के चारों दावों का लक्षित निराकरण दिया, जबकि कुछ न करना पक्ष ने मुख्यतः अपनी मूल प्रतिज्ञाएँ दोहराईं।

निष्क्रियता‑तटस्थता, अनिश्चितता, वैधता और फिसलन ढलान—चारों बिंदुओं पर लीवर खींचना पक्ष ने क्रमशः पूर्वानुमेय‑हानि, अपेक्षित‑हानि न्यूनकरण, आपदा‑वैधता और संदर्भ‑बंध नियमों के साथ ठोस उत्तर दिए। विशेषतः ‘इरादा बनाम परिणाम’ और ‘साधन बनाम जोखिम मोड़ना’ की भेदरेखा को उन्होंने स्पष्ट कर दिया, जिससे प्रत्यक्ष हिंसा का आरोप कमजोर पड़ता है। दूसरी ओर, कुछ न करना पक्ष के प्रत्युत्तर ‘जान‑बूझकर हत्या’ की पुनरावृत्ति और सामान्यीकृत भय की आशंका तक सीमित रहे, जो प्रस्तावित सीमाओं/गार्डरेल्स को बेअसर सिद्ध नहीं कर पाए। इसलिए वाद‑विवादात्मक प्रभावशीलता में लीवर खींचना पक्ष मजबूत लगा।

निर्माणात्मक नीति‑दिशा में लीवर खींचना पक्ष ने स्पष्ट, फिसलन‑रोधी और जवाबदेह नियम का खाका दिया, जो भरोसा और पूर्वानुमेयता बढ़ाता है।

उन्होंने स्वचालित प्रणालियाँ, आपदा प्रबंधन और ट्रायेज सरीखे संदर्भों में ‘कम‑हानि हेतु सीमित हस्तक्षेप’ को सुस्पष्ट शर्तों के साथ बाँधा और अंग‑उत्पादन जैसे निषिद्ध मामलों से सिद्धांतगत भेद बताया। इससे सामाजिक भरोसा घटने के बजाय बढ़ने का तर्कसंगत आधार बना—लोग जान पाएँगे कि संकट में अधिकतम जीवन‑रक्षा हेतु नियंत्रित, पारदर्शी हस्तक्षेप होगा। इसके विपरीत, कुछ न करना पक्ष का कठोर निषेध व्यवहार में जड़ता और पाँच पर पूर्वानुमेय असमान भार छोड़ता है, जो न तो समता‑सम्मत लगता है, न ही जनकल्याणोन्मुख। इसलिए निर्माणात्मकता और नीतिगत उपयोगिता में भी लीवर खींचना पक्ष अधिक प्रेरक रहा।

वैश्विक सांख्यिकी (सभी भाषाएं और मॉडल)

कुल निर्णय
90
15 भाषाएं × 6 मॉडल
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना की जीत
63
70% निर्णयों में जीत
ट्रॉली समस्या: कुछ न करना की जीत
27
30% निर्णयों में जीत
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना कुल मिलाकर ट्रॉली समस्या: कुछ न करना कुल मिलाकर
70%
30%

Language × Model Winner Matrix

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ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना विजय
ट्रॉली समस्या: कुछ न करना विजय
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GPT-5
GPT-5 Mini
GPT-5 Nano
Gemini 2.5 Flash
Gemini 2.5 Flash Lite
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ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
ट्रॉली समस्या: कुछ न करना
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
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ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
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ट्रॉली समस्या: कुछ न करना
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना

मॉडल और भाषा वरीयताएं

ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना समर्थक मॉडल
Gemini 2.5 Flash
93% समय ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना का समर्थन करता है
ट्रॉली समस्या: कुछ न करना समर्थक मॉडल
GPT-5 Nano
67% समय ट्रॉली समस्या: कुछ न करना का समर्थन करता है
ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना समर्थक भाषा
العربية
83% समय ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना का समर्थन करती है
ट्रॉली समस्या: कुछ न करना समर्थक भाषा
Deutsch
83% समय ट्रॉली समस्या: कुछ न करना का समर्थन करती है

विस्तृत रैंकिंग

मॉडल समर्थन रैंकिंग

शीर्ष 5 ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना समर्थक मॉडल

# मॉडल समर्थन दर न्यायाधीश
1 Gemini 2.5 Flash 93% 15
2 GPT-5 Mini 93% 15
3 GPT-5 87% 15
4 Claude Sonnet 4.0 73% 15
5 Gemini 2.5 Flash Lite 40% 15

शीर्ष 5 ट्रॉली समस्या: कुछ न करना समर्थक मॉडल

# मॉडल समर्थन दर न्यायाधीश
1 GPT-5 Nano 67% 15
2 Gemini 2.5 Flash Lite 60% 15
3 Claude Sonnet 4.0 27% 15
4 GPT-5 13% 15
5 Gemini 2.5 Flash 7% 15
भाषा समर्थन रैंकिंग

शीर्ष 5 ट्रॉली समस्या: लीवर खींचना समर्थक भाषाएं

# भाषा समर्थन दर न्यायाधीश
1 العربية 83% 6
2 Bahasa 83% 6
3 English 83% 6
4 Français 83% 6
5 日本語 83% 6

शीर्ष 5 ट्रॉली समस्या: कुछ न करना समर्थक भाषाएं

# भाषा समर्थन दर न्यायाधीश
1 Deutsch 83% 6
2 Español 50% 6
3 हिन्दी 33% 6
4 Italiano 33% 6
5 한국어 33% 6